दिल्ली की रहने वाली पूजा शर्मा (26 साल) के मां की साल 2022 में मौत हो गई। बड़े भाई के मर्डर के बाद पिता की हालत खराब हो गई। कोमा में चले गए। ऐसी स्थिति में परिवार की जिम्मेदारी पूजा पर आ पड़ी। भाई के अंतिम संस्कार के वक्त भी परिवार का कोई पुरुष सदस्य नहीं था। उन्हें ही अपने भाई के अंतिम विदाई की रस्में निभानी पड़ी। उसके बाद से ही पूजा को उन लोगों के हालात समझ आए। मौत के बाद जिनका कोई नहीं होता। इस ख्याल ने उन्हें इतना परेशान किया कि पूजा ने लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार करना शुरु कर दिया।

अंतिम संस्कार के महीनों बाद मिला मृतक का ​परिवार

पूजा का कहना है कि वह मृत लोगों के धर्म के मुताबिक उनकी अंतिम विदाई की रस्में करती हैं। एक बार उन्होंने एक लावारिस लाश का अंतिम संस्कार किया था। कुछ महीने बाद मृतक का परिवार उनसे मिला। उन लोगों ने पूजा से बताया कि उनका बेटा घर से चला गया था। काफी खोजबीन के बाद भी वह लोग अपने बेटे तक नहीं पहुंच पाए। उस परिवार ने अपने बेटे के अंतिम संस्कार के लिए पूजा का आभार जताया। इस घटना से पूजा को लगा कि वह सही राह पर हैं।

2022 से कर रहीं लावारिस शवों का अंतिम संस्कार

पूजा शर्मा ने सोशल वर्क में पोस्ट ग्रेजुएशन किया है। सफदरगंज हॉस्पिटल में एचआईवी काउंसलर की जॉब कर रही थीं। भाई का अंतिम संस्कार करने करना पड़ा। तब यह विचार आया और अकेले दुनिया छोड़कर जाने वालों का परिवार बनने का फैसला किया। साल 2022 से लावारिस शवों के अंतिम संस्कार का काम कर रही हैं। अब तक 4000 शवों को अंतिम विदाई दे चुकी हैं। पूजा के पिता दिल्ली मेट्रो में कॉन्ट्रैक्ट ड्राइवर के रूप में काम करते हैं। दादी को पेंशन मिलती है। वह लोग पूजा की उनके काम में मदद करते हैं।

एक अंतिम संस्कार में 2,200 का खर्च

यह काम करना इतना आसान भी नहीं था। एक डेड बॉडी के अंतिम संस्कार में करीबन 2,200 रुपये खर्च होते हैं। लावारिसों के अंतिम संस्कार में अब तक वह अपनी जमा पूंजी लगा चुकी हैं। लोगों को अंतिम विदाई के लिए पैसे बचा सकें। इसलिए उन्होंने अपने खर्चों में कटौती भी की। समय के साथ अब लोगों का साथ मिलना शुरु हो गया है। उनकी हिम्मत को देखते हुए कुछ लोग आर्थिक मदद करने को भी आगे आ रहे हैं। पूजा ने लोगों को सशक्त बनाने के मकसद से 'ब्राइट द सोल फाउंडेशन' एनजीओ भी शुरु की है।

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