गोरखपुर। हॉकी भारत का नेशनल गेम है इसके बावजूद देश की अवाम से लेकर ऊंचे ऊंचे ओहदे पर बैठे लोगों के अंदर हॉकी के लिए वह जोश और जज्बा नहीं नजर आता जो क्रिकेट के लिए नजर आता है। हॉकी के खिलाड़ी गुमनामी के अंधेरे में खो जाते हैं।  आज हम आपको एक ऐसे ही गुमनाम खिलाड़ी से रूबरू कराने जा रहे हैं जिसने इस देश के लिए एक बार नहीं बल्कि पांच बार नेशनल लेवल पर हॉकी खेला। इनका नाम है खुर्शीद मस्तान। माय नेशन हिंदी से बात करते हुए खुर्शीद ने अपनी जर्नी शेयर की।

 

 

कौन है खुर्शीद मस्तान

गोरखपुर के जटेपुर के रहने वाले खुर्शीद को बचपन से ही हॉकी से लगाव था उनके वालिद मोहम्मद शरीफ की 65 साल से साइकिल  रिपेयरिंग की दुकान है जिस पर खुर्शीद बैठते हैं । घर में 6 भाई हैं। खुर्शीद सबसे छोटे हैं।  इस्लामिया कॉलेज से खुर्शीद  ने अपनी स्कूलिंग कंप्लीट की और वहीं से अपना बीकॉम भी कंप्लीट किया। स्कूल के दिनों में वह हॉकी खेलते रहते थे। घर की माली हालत बहुत अच्छी नहीं थी, इसलिए खुर्शीद अपने पिता के साथ पंचर की दुकान पर वक़्त देते थे। 

 

12 साल की उम्र से खेल रहे हैं हॉकी

खुर्शीद ने 12 साल की उम्र से हॉकी खेलना शुरू किया था। पिता की पंचर की दुकान पर बैठकर खुर्शीद पैसा इकट्ठा करके स्कूल की फीस जमा करते थे। माय नेशन हिंदी से बात करते हुए खुर्शीद ने बताया कि वक्त ने कंधों पर जिम्मेदारियां ज्यादा डाल दी। दो भाइयों को फ़ालिज का अटैक पड़ चुका है जिसके कारण वह बिस्तर पर रहते हैं। 1 साल पहले पिता की डेथ हो चुकी है। पिता की दुकान अब जीविका का साधन बन चुकी है। बीकॉम करने के बाद भी नौकरी के लिए दर-दर भटकना पड़ा। इन तमाम संघर्षों के दरमियान खुर्शीद का हॉकी का सफर चला रहा और उन्होंने नेशनल लेवल तक की चैंपियनशिप हासिल कर ली।

 

 

आज भी नेशनल लेवल के अंपायर हैं खुर्शीद

खुर्शीद कहते हैं मैं आज भी बच्चों को हॉकी की ट्रेनिंग देता हूं 30 नवंबर को भी लखनऊ जाना है गोमती नगर के शहीद स्टेडियम में जहां हॉकी का टूर्नामेंट है। नेशनल लेवल की हॉकी में अंपायरिंग करता हूं । इस काम के लिए अक्सर मुझे अपनी दुकान बंद करनी पड़ती है जिससे मेरा बहुत नुकसान होता है। खुर्शीद कहते हैं मैं चार बार राष्ट्रीय स्तर पर हॉकी के लिए खेल चुका हूं अगर मुझे मौका मिला होता तो शायद हॉकी में बहुत कुछ कर सकता था यही सब सोच कर मैं बच्चों को ट्रेनिंग देता हूं कि मैं आगे बढ़ नहीं पाया तो क्या हुआ शायद मेरे  सिखाए  हुए बच्चे इस देश के लिए गोल कर सकें।

 

 

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