मुंबई: वास्तव में यह दलित मुस्लिम गठबंधन बनाने की कोशिश है। हालांकि यह गठबंधन शिवसेना –भाजपा के भी सख्त खिलाफ है मगर कई लोग इसे भाजपा शिवससेना की बी टीम मानते हैं क्योंकि यह सेकुलर वोटों का ही विभाजन करेगा।

वैसे महाराष्ट्र में दलित मुस्लिम गठबंधन का प्रयोग कोई नया नहीं है। 1984 के भिवंड़ी दंगों के बाद मुंबई के तस्कर हाजी मस्तान ने रिपब्लिकन पार्टी के एक गुट के दलित नेता जोगेद्र कवाडे के साथ दलित मुस्लिम महासंघ नामक राजनीतिक दल  बनाया था। इसके पीछे सोच यह थी मुंबई के कई इलाके ऐसे हैं जहां दलित और मुस्लिमों का बाहुल्य है। वहां यह जनाधार शिवसेना को टक्कर दे सकता था। यह भी उम्मीद की जा रही थी हाजी मस्तान बाल ठाकरे का करारा जवाब हो सकता है। लेकिन 1994 में हाजी मस्तान की मृत्यु के बाद यह प्रयोग नाकाम हो गया ।

अब यह प्रयोग नए तरीके से दोहराया जा रहा है। इसमें प्रकाश आंबेडकर की पार्टी है और औवैसी की एमआईएम है। महाराष्ट्र में भी एमआईएम काफी ताकतवर है क्योंकि कभी मराठवाड़ा का बहुत सा इलाका निजाम के राज्य का हिस्सा था।  पिछले विधानसभा चुनाव में उसके तीन विधायक जीते हैं। औरंगाबाद में उसके एक चौथाई पार्षद हैं। 

आंबेडकर की पार्टी भी कभी कभी अपनी ताकत दिखा देती है। मगर पिछले सालभर से उनकी राजनीति चर्चा  में है। भीमा कोरेगांव का प्रदर्शन अब भी कुछ दलितो को आंदोलित करता है। आंबेडकर उसके सूत्रधारो में से थे।। 

उसमें यह भी उजागर हुआ कि उनकी अर्बन नक्सलियों से भी अच्छे रिश्ते  है। इसके बाद वे मुंबई बंद के कारण चर्चा में आए। यह बंद जिस तरह से सफल हुआ उसके बाद कई पत्रकारों ने टिप्पणी की कि बाल ठाकरे के बाद प्रकाश आंबेडकर ही ऐसे व्यक्ति हैं जो मुंबई बंद कराने में कामयाब रहे।

कुछ समय पहले तक महाराष्ट्र में भाजपा के खिलाफ महागठबंधन बनाने की चर्चाएं जोरों पर थी। ऐसा माना जा रहा था कि कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का गठबंधन वामदलों ,दलित पार्टियों को जोड़कर इसे एक व्यापक रूप देगा जो केसरिया गठबंधन को धूल चटा सकता है। 

मगर प्रकाश आंबेड़कर ने इन उम्मीदों पर पानी फेर दिया। इस गठबंधन के बजाय उन्होंने अपना अलग गठबंधन बना लिया। इसके तहत उन्होंने ओवैसी की अपने उग्रवादी मुस्लिम तेवरों के ले जानी जानेवाली एआईएमआईएम के साथ गठबंधन कर लिया। 

असल में प्रकाश आंबेडकर की इच्छा दलित मुस्लिम गठबंधन बनाकर सनसनी पैदा करने की है। इस गठबंधन से राजनीतिक पर्यवेक्षक हक्के-बक्के हैं। 

यह तो सभी जानते है कि प्रकाश आंबेडकर भाजपा शिवसेना की राजनीति के खिलाफ हैं मगर उसे हराने के लिए वे सबसे बेहतर विकल्प कांग्रेस राष्ट्रवादी के महागठबंधन की राजनीति में शामिल नहीं हुए, बल्कि अपना अलग गठबंधन बना लिया। इस गठबंधन के बारे में यही माना जाता है कि राज्य में सेकुलर गठबंधन के वोट काटेगा। यूंभी अब तक एआईएमआईएम सेकुलर दलों के वोट काटने के लिए ही कुख्यात रही है।

इस गठबंधन पर लोगों को अचरज इसलिए भी हो रहा है कि आंबेडकर भाजपा शिवसेना को सांप्रदायिक मानते हैं मगर उसका विरोध करते करतेहुए वे दूसरे सिरे की सांप्रदायिक पार्टी यानी मुस्लिम सांप्रदायिक पार्टी से गठबंधन कर बैठे।

आंबेडकर की पार्टी का कांग्रेस आदि सेकुलर दलों के साथ गठबंधन न हो पाने की वजह यह भी थी कि आंबेडकर अपनी ताकत की तुलना में कहीं ज्यादा सीटें मांग रहे थे। वे महाराष्ट्र की 48 सीटों में से 12 सीटे मांग रहे थे जिसके लिए कांग्रेस किसी भी तरह तैयार नही हुई। दूसरी तरफ वह कांग्रेस से तो गठबंधन करने के लिए तैयार थी मगर राष्ट्रवादी कांग्रेस से नहीं। ऐसी हालत में गठबंधन हो ही नहीं सकता था। 

इसको लेकर पवार और आंबेडकर के बीच काफी आरोप प्रत्यारोप होते रहे। आंबेडकर ने पहले आरोप लगाया पवार भले ही सेकुलर हो मगर उनकी पार्टी सेकुलर नहीं है । इस पर पवार ने तो आंबेडकर से कहा वे उन्हें धर्मनिरपेक्षता न सिखाए। 

औवेसी की पार्टी के साथ उनकी पार्टी के गठबंधन से सभी चकित हैं।अपने वोट बैंक में नए समुदायों को जोड़ने की इच्छा ने प्रकाश आंबेजकर को इस स्थिति में पहुंचाया कि वे सांप्रदायिकता के लिए शिवसेना और भाजपा का घोर विरोध करते थे। मगर नए समुदाय के वोट पाने की इच्छा उन्हें सांप्रदायिकता के दूसरे सिरे पर उस दल के तरफ ले गई जो मुस्लिम कट्टरपन के ले जाना जाता है। किसी भी सेकुलर व्यक्ति के लिए औवैसी बंधुओं के भाषणों को पचा पाना मुश्किल है।

मगर वंदे मातरम पर प्रकाश आंबेडकर के विचारों से पता चलता है कि उन्होंने औवैसी के साथ केवल सीटों का समझौता ही नहीं विचारों का समझौता भी किया है। पिछले दिनों जनगण मन राष्ट्रीय गान है तो वंदे मातरम की क्या जरूरत- यह विवादित बयान देकर वे सुर्खियों में रहे। 

वैसे अपनी राजनीति से तो वे पिछले सालभर से लगातार चर्चा में रहे। भीमा कोरेगांववाले मामले से यह भी लगता है कि वे केवल मुस्लिम उग्रवाद ही नहीं नक्सली उग्रवाद को भी सहलाते रहे हैं। मगर चर्चा में रहना एक बात है और उस शोहरत को वोटों में तब्दील करा पाना दूसरी बात है।

 
वैसे प्रकाश आंबेड़कर की जो ट्रैजेडी रही है वह महाराष्ट्र के दलित आंदोलन की भी ट्रैजेडी है। महाराष्ट्र भले ही बाबासाहब आंबेडकर के कारण दलित आंदोलन की जन्मभूमि रहा हो मगर वहां दलितों का प्रतिशत मात्र 12 प्रतिशत ही है जो उत्तर प्रदेश ,हरियाणा और पंजाब की तरह एक चौथाई या उससे ज्यादा नहीं है। जिससे कि यह राजनीति में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभा पाए। 

उसमें भी बाबासाहब द्वारा बौद्ध धर्म ग्रहण करने के बाद दलित दो फाड हो गए । ज्यादातर बाबासाहब की जाति के महारों ने ही बौद्ध धर्म स्वीकार किया जो दलितों की आबादी के पचास प्रतिशत थे। वही बाबासाहब द्वारा स्थापित रिपब्लिकन पार्टी का जनाधार भी बने और नेता भी। महाराष्ट्र में दलित कुल आबादी के 12 प्रतिशत हैं इनमें से 6 प्रतिशत महार थे जो रिपब्लिकन पार्टी के साथ रहेऔर 6 प्रतिशत मांग मातंग जैसी अन्य दलित जातियां के थे। 

 वे कांग्रेस और अन्य पार्टियों के साथ चले गए। सिर्फ महारों के बल पर दलित कोई बड़ी ताकत नहीं बन सकते थे। उसमें भी बाद में रिपब्लिकन पार्टी के कई गुट बन गए। उसके बाद बनी दलित पैंथर भी गुटबाजी का शिकार हो गई। प्रकाश आंबेडकर ने जब देखा कि रिपब्लिकन पार्टी केवल बौद्ध और महारों में सिमट कर रह गई है तो उन्होंने कांशीराम का फार्मूला अपनाकर रिपब्लिकन पार्टी को बहुजनों की पार्टी बनाने की कोशिश की। फिर बहुजन महासंघ के साथ मिलकर भारिपा –बहुजन महासंध पार्टी बनाई। 

हालांकि प्रकाश आंबेडकर कांशीराम पर कुछ भी कहने से बचते रहे हैं मगर उन्हें जो थोड़ी बहुत सफलता मिली वह तभी जब वे कांशीराम के रास्ते पर यानी बहुजन एकजुटता के रास्ते पर चले। 1995 के बाद का काल प्रकाश आंबेडकर का स्वर्णयुग था जब सारे दलित गुटों के एकजुट होना पड़ा था। उस समय आंबेडकर बहुजनों को सत्ता में भागीदारी देने के नारे के साथ वे चुनाव में उतरे तब कुछ ओबीसी भी उनसे जुड़े और तब भारिप बहुजन महासंघ के छह विधायक जीते थे और उनमें से कई कांग्रेस सरकार में मंत्री बने। 

इसके अलावा 1996 1997 में वे खुद अकोला से लोकसभा के लिए जीते।मगर यह स्वर्णयुग लंबे समय तक नहीं चल पाया। उसके बाद वे राजनीति के .हाशिये पर ही हैं।
उन्होंने ओबीसी को भी साथ जोड़ने की कोशिश की यह प्रयोग सफल भी हुआ मगर राज्य के मात्र तीन चार जिलों में ही। वह भी चार पांच साल के लिए। इस बीच सभी राजनीतिक दलों ने भी ओबीसी में अपना जनाधार बना लिया तब प्रकाश आंबेड़कर की दाल नहीं गल पाई। 

तबसे अबतक वे राजनीति के हाशिये पर ही हैं। असल में महाराष्ट्र के दलित बहुत मुखर है मगर कोई राजनीतिक ताकत नहीं है। अपने बूते पर आरपीआई विधानसभा की एक सीट भी नहीं जीत सकती। यही वजह है कि इस चुनाव में सेकुलर गठबंधन ने प्रकाश आंबेडकर के साथ कोई गठबंधन नहीं किया। केसरिया खेमे का रामदास अठावले के साथ गठबंधन है मगर उसे कोई सीट नहीं दी।

प्रकाश आंबेडकर को जो सफलता मिली उसमें अन्य दलों का भी महत्वपूर्ण योगदान था। यह चमत्कार अब वे एआईएमआईएम साथ जुड़ कर करना चाहते है। महाराष्ट्र में एआईएमआईएम का मुस्लिम इलाकों में अच्छा असर है उसके तीन विधायक और और औरंगाबाद नगर निगम में काफी नगर सेवक हैं। 
महाराष्ट्र में मुस्लिम आबादी 11.5 प्रतिशत है जिसे बहुत ज्यादा नहीं कहा जा सकता। मगर राज्य सरकार ने मराठाओं को तो आरक्षण दिया मगर मुसलमानों को नहीं जिसे वे भुनाना चाहेंगे। इससे सेकुलर गठबंधन के वोट तो काटे जा सकते हैं मगर चौंधिया देनेवाली सफलता हासिल नहीं की जा सकती। यही महाराष्ट्र के दलित आंदोलन की  ट्रेजेडी है और प्रकाश आंबेडकर की भी।

हालही में एबीपी टीवी ने  महाराष्ट्र के बारे में चुनावी सर्वे किया है जिसमें उसने 48 में से 37 सीटे भाजपा शिवसेना गठबंधन को दी है तो कांग्रेस राष्ट्रवादी के गठबंधन को 11 ,प्रकाश आंबेडकर -एमआईएम के गठबंधन को शून्य। इसके बावजूद यह माना जा रहा है कि उनका गठबंधन सेकुलर गठबंधन के वोटों में सेंध लगाएगा। आसार तो यही लग रहे हैं कि इस दलित मुस्लिम गठबंधन का भी वही हश्र होगा जो हाजी मस्तान के दलित मुस्लिम गठबंधन का हुआ था।