
समलैंगिकता को आईपीसी की धारा 377 के तहत अपराध घोषित करने के खिलाफ दायर क्यूरेटिव याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि हम इस मामले पर फैसला दे चुके है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि समलैंगिकता अपराध नहीं है। देश मे सबको समानता का अधिकार है। एलजीबीटी को भी समानता से रहने का अधिकार है।
बता दें कि मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा था कि अगर कोई कानून मौलिक अधिकारों का हनन करता है, तो कोर्ट इस बात का इंतजार नही करेगा कि सरकार उसे रद्द करें। इससे पहले कोर्ट ने 11 दिसंबर 2013 को सुरेश कुमार कौशल बनाम नाज फाउंडेशन मामले में दिल्ली हाइकोर्ट के फैसले को पलटते हुए समलैंगिकता को अपराध माना था। 2 जुलाई 2009 को दिल्ली हाइकोर्ट ने आईपीसी की धारा 377 को असंवैधानिक करार दिया था।
इस मामले में पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी थी और फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों के सामने क्यूरेटिव बेंच में मामला लंबित था। वही कोर्ट ने 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने नवतेज सिंह जोहर व अन्य की याचिका पर सुनवाई की और समलैंगिक कर्ता को अपराध के दायरे से बाहर कर दिया था गौरतलब है कि आईपीसी की धारा 377 के तहत 2 लोग आपसी सहमति या असहमति से अप्राकृतिक संबंध बनाते है, और उन्हें दोषी करार दिए जाते है तो उनको 10 साल की सजा से लेकर उम्रकैद की सजा हो सकती है और ये गैर जमानती है।
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